अपनी फोक्सुन्दो की यात्रा के बाद मैं नेपाल जाने के लिए बहुत उत्साहित था। लगभग एक साल होने को आया था और मैंने पिछले एक साल में नेपाल में कोई भी यात्रा नहीं की थी, इसलिए मैं हमेशा से चाह रहा था कि कोई एक ऐसी जगह तलाश करूँ जो मुझे उतना ही मज़ा और थ्रिल दे सके जितना मुझे फोक्सुन्दो में मिला था। इंटरनेट पर रिसर्च करने के बाद मैंने देखा कि पश्चिमी नेपाल के मुगु जिले में रारा ताल है, और मैं वहाँ जा सकता हूँ। पश्चिमी नेपाल मेरा पसंदीदा इलाका इसलिए भी है क्योंकि वह मेरे गृह जनपद बहराइच से पास है और वहाँ से जाना आसान रहता है। दूसरा मुख्य कारण यह है कि वहाँ लोग कम जाते हैं, और जिस जगह को कम देखा गया हो, जिसके बारे में जानकारी भी कम हो, वहाँ जाना अपने आप में एक रोमांचकारी काम होता है। इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने निश्चय कर लिया कि इस बार मैं भारत से रारा झील, नेपाल अकेले ही जाऊँगा। इस बार मैं अकेला जाने वाला था, पिछली बार की तरह मेरा दोस्त इस बार मेरे साथ नहीं था, तो मन में एक शंका भी थी कि कैसे जाना होगा, क्या होगा। पर रोमांच मुझे हमेशा अच्छा लगता है, इसलिए मैं ज़्यादा तैयारी के साथ नहीं जाता। मतलब इंटरनेट पर मेरी तैयारी कम ही होती है, हाँ, कुछ ब्लॉग्स, थोड़े वीडियो और फोटो ज़रूर देख लेता हूँ कि रास्ता कैसा होने वाला है।
यात्रा की शुरुआत: रुपैडिहा से छिन्चु तक

इन्हीं सब चीज़ों के साथ मैं दीपावली की छुट्टी पर घर गया। 20 अक्टूबर, 2025 को दीपावली थी, मैंने दीपावली मनाई और उसके ठीक तीन दिन बाद, यानी 23 अक्टूबर की सुबह करीब 6 बजे, मैं नेपाल के लिए घर से निकल पड़ा। लगभग 40 से 50 मिनट में मैं नेपालगंज और रुपैडिहा के बॉर्डर पर पहुँच गया। सुबह मैंने रुपैडिहा बाज़ार में ही करीब 8,000 भारतीय रुपए नेपाली रुपयों में बदलवाकर अपने पास कैश रख लिया, ताकि पिछली बार की तरह इस बार कैश की दिक्कत न हो। फिर लगभग साढ़े सात बजे तक भंसार पर मुझे बाइक का परमिट भी मिल गया। इस बार मुझे पहले से पता था कि मेरे लिए 5-6 दिन का परमिट भी काफ़ी होता, लेकिन मैंने फिर भी 8 दिन का बनवाया और उसके बाद आगे निकल पड़ा। नेपाल में प्रवेश करते ही मैंने सीधे चलना शुरू किया। पिछली बार मेरा ओवर स्पीडिंग का चालान कट गया था, हम लोग 80 की स्पीड से चल रहे थे, इसलिए इस बार मैंने अपनी स्पीड को बहुत ही नियंत्रित रखा। पूरे रास्ते मैं नज़र रखते हुए चला कि कहीं कोई स्पीड चेकिंग वाला या ट्रैफिक पुलिस वाला मेरा चालान न काट दे। हमेशा यही ध्यान रखते हुए मैं सावधानी से चलता रहा।
इसके बाद मैं कोहलपुर पहुँचा, और कोहलपुर के बाद जंगल का वह हिस्सा पड़ता है जो बर्दिया नेशनल पार्क से होकर जाता है। इस बार भी हमें दो-दो के ग्रुप में छोड़ा गया, तो हम दो बाइक वाले और एक तीसरा, यानी तीन बाइकर्स का एक ग्रुप नेशनल पार्क के रास्ते से होते हुए आगे बढ़ा, और फिर हमने नेशनल पार्क पार कर लिया। अब बबई बाज़ार आया, फिर बबई नदी आई, और मुझे पिछले साल का सारा दृश्य याद आने लगा। बबई में मैंने थोड़ा ब्रेक लिया, वॉशरूम गया, एक बोतल पानी पिया और कुछ लोगों से बात करने लगा। तभी एक लड़का मिला जो मेरी बाइक के बारे में पूछने लगा। उसने बताया कि जो बाइक मैं चला रहा हूँ, वह नेपाल में इसी साल रिलीज़ हुई है और उसकी कीमत लगभग 9,00,000 नेपाली रुपए है। यह सुनकर मुझे थोड़ा अजीब सा लगा, क्योंकि यह मॉडल तो अब हमारे यहाँ आ ही नहीं रहा, और वह यहाँ अभी आ रहा था। खैर।
बबई के बाद, जैसा कि आप जानते हैं, जो लोग नेपाल गए हैं उन्हें पता है, फिर से चढ़ाई शुरू होती है। हम हर्रे पहुँचे, जो सुर्खेत जिले में पड़ता है, हर्रे की चढ़ाई चढ़ी और फिर वहाँ से ढलान पर उतरते हुए नीचे छिन्चु पहुँचे। छिन्चु पहुँचकर मुझे यह देखकर बहुत ही हैरानी हुई कि लगभग सारे ही बाज़ार, चाहे नेपालगंज हो, कोहलपुर हो, बबई हो, छिन्चु हो या हर्रे हो, हर जगह काफ़ी शांति थी। लोग बहुत कम थे और ऐसा लग रहा था कि सब अपने-अपने घरों में हैं। रास्तों पर आते-जाते जो इक्का-दुक्का लोग दिख रहे थे, उन्होंने माथे पर टीका लगाया हुआ था और गले में माला पहनी हुई थी। दीपावली का समय था, तो सब अपने-अपने परिवारों के साथ त्योहार मनाने में लगे हुए थे। छिन्चु का पूरा बाज़ार बंद पड़ा था, गाड़ियाँ नहीं चल रही थीं, सड़क पूरी तरह खाली थी, और इसी वजह से मैं और जल्दी चल पा रहा था।
नेपाली सैनिकों का साथ और बड्डीचौर की मेहमाननवाज़ी
तभी छिन्चु से सुर्खेत की तरफ जाने वाले रास्ते पर, बाईं तरफ, मुझे तीन नेपाली युवक मिले। उन तीनों ने मुझे रोका और पूछा कि क्या मैं उन्हें आगे तक छोड़ सकता हूँ, लिफ्ट दे सकता हूँ। मैंने कहा, ठीक है। तीन में से दो एक बाइक पर थे और एक अकेला था, तो जो अकेला था वह मेरे साथ लिफ्ट लेना चाहता था। उन्हें सुर्खेत के आगे बड्डीचौर तक जाना था। मैंने अपना पूरा सामान खोला, दोबारा बाँधा और उनसे कहा कि आप सामान लेकर बैठ जाइए। मैं समझ सकता था कि उस दिन कोई गाड़ी चल ही नहीं रही थी, इसलिए उन्हें जाने में दिक्कत होती, और वे भी इसी सहारे पर मेरे साथ बैठ गए। रास्ते में दिक्कत ज़रूर हुई, क्योंकि उनका सामान बहुत ज़्यादा था, वे ठीक से बैठ नहीं पा रहे थे और बार-बार गाड़ी का बैलेंस बिगड़ रहा था, पर फिर भी थोड़ी-थोड़ी बात करते हुए हम आगे बढ़ते रहे। वे नेपाली बोल रहे थे, मैं हिंदी बोल रहा था, और हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने बताया कि वे नेपाली आर्मी के जवान हैं, बर्दिया नेशनल पार्क में उनकी ड्यूटी है और अब वे छुट्टियों पर घर जा रहे हैं।
सुर्खेत तक हम सब साथ चले। सुर्खेत पहुँचने के बाद जो दो लोग दूसरी बाइक पर थे, वे वहीं रुक गए। हमने उन्हें बाय-बाय बोला और लगभग आधा घंटा और चलने के बाद हम बड्डीचौर पहुँचे। बड्डीचौर एक छोटा सा गाँव है, जहाँ एक स्टॉपेज है। सुर्खेत से आगे मुगु, जुमला या हुम्ला की तरफ जो बसें चलती हैं, उन सबका यह बीच का रेस्टिंग पॉइंट है। वहाँ मैंने उन्हें ड्रॉप किया। वे अपने गाँव की तरफ जाने वाले थे, पर उससे पहले रुके और कहा कि आपको बहुत आगे की यात्रा करनी है, इसलिए बेहतर होगा कि आप कुछ खाने-पीने का सामान लेकर चलिए। उन्होंने मुझे बिस्किट दिए, और काफ़ी सारे दे रहे थे, मुझे लगता है दस पैकेट के करीब। मेरे बैग में इतनी जगह नहीं थी, तो मैंने उनमें से सिर्फ़ एक पैकेट लिया। वे कह रहे थे कि ये बिस्किट बहुत अच्छे हैं, हाई एनर्जी बिस्किट हैं, हम आर्मी में यही इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मैंने सोचा कि बहुत ज़्यादा लेना ठीक नहीं है, वे यह सब अपने घर पर बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए लेकर जा रहे हैं, इसलिए उनके सम्मान में मैंने बस एक पैकेट रख लिया। फिर मैं बड्डीचौर में ही एक दुकान पर आराम करने के लिए थोड़ा रुका। वह दुकान तो थी, पर उस दिन बंद थी। दुकान के सारे परिवार वाले आपस में मिलकर त्योहार मना रहे थे, और उनके बच्चे, जो काठमांडू में पढ़ाई-लिखाई करते हैं, छुट्टी में घर वापस आए हुए थे। वे हिंदी काफ़ी अच्छे से समझ रहे थे, तो मैं उनसे बातें करने लगा। उन्होंने मुझे चाय पिलाई, समोसा खिलाया, और किसी भी चीज़ के पैसे नहीं लिए। उन्होंने कहा कि आप हमारे मेहमान हैं और आज वैसे भी दुकान बंद है, तो आप इसे हमारी तरफ से एक भेंट, या त्योहारी समझकर खा लीजिए। उनका यह अपनापन मुझे छू गया। वहीं खा-पीकर मैं आगे की तरफ बढ़ा।
सुनसान रास्ता और मान्मा की चढ़ाई
बड्डीचौर में लगभग 40 मिनट आराम करने, कुछ खाने-पीने और बातचीत करने के बाद जब मैं आगे निकला, तो उसके बाद का रास्ता अकेला, सुनसान और जंगलों के बीच से होकर जाता था। जैसा कि मैंने बताया, एक भी गाड़ी नहीं चल रही थी, इसलिए ऐसा लग रहा था कि मैं किसी सन्नाटे में अकेला ही चला जा रहा हूँ। इसी तरह आगे बढ़ते हुए तल्लो डोंगेश्वर आया। तल्लो डोंगेश्वर एक ढलान है, जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं, यानी कर्णाली नदी में एक छोटा नाला आकर मिलता है। उस जगह से थोड़ा पहले लगभग हेयरपिन जैसी सड़क है, जिसमें 7-8 टर्न हैं, वहाँ से आप ढलान में उतरते हैं और फिर नदी के किनारे-किनारे रास्ता आगे बढ़ता है। वहाँ तक सड़क ठीक थी, पर उसके बाद उसकी हालत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी। ढलान ही खराब थी और उसके आगे की सड़क तो लगातार टूटी हुई मिली। इस रास्ते पर अच्छी सड़क बस कहीं-कहीं थोड़े-थोड़े पैच में ही मिलती है। बाकी पूरा रास्ता धूल भरा, उबड़-खाबड़ और पथरीला है, जिस पर आप मुश्किल से दूसरे-तीसरे गियर से ऊपर नहीं जा सकते। यह कर्णाली हाईवे है, और आप कर्णाली नदी के किनारे-किनारे लगातार चलते रहते हैं। वहाँ से साईंखोला और राकम कर्णाली होते हुए आप दैलेख जिले में पहुँचते हैं, जिसका ज़्यादातर हिस्सा कच्चे रास्तों का ही है। राकम कर्णाली एक छोटा सा बाज़ार है जहाँ आपको बहुत सारी गाड़ियाँ रुकी हुई दिखाई देती हैं, क्योंकि यहाँ से एक रास्ता हुम्ला की तरफ जाता है, और जिन लोगों को हुम्ला जाना होता है उनका यहाँ हॉल्ट होता है। पर मुझे क्योंकि और आगे जाना था, तो मैं वहाँ से मान्मा के लिए निकल पड़ा, जो कालीकोट जिले का जिला मुख्यालय, यानी सदर मुकाम है। रास्ते लगातार खराब थे, इसलिए मैं बार-बार ब्रेक लेते हुए चल रहा था। मान्मा से पहले एक जगह मुझे होटल मिला, जहाँ तिला कर्णाली और कर्णाली नदी आपस में मिलती हैं। उस जगह का नाम है जीते बाज़ार, कालीकोट। वहाँ मैं रुका, चाय-समोसा और खाना खाया, और लोगों से पूछा कि मैं मान्मा कब तक पहुँच जाऊँगा।

यहाँ तक आते-आते शाम के लगभग 4 बजने वाले थे। मेरा इरादा यह था कि मान्मा को पार करके कालीकोट जिले में ही आगे नाग्मा तक पहुँच जाऊँगा और वहीं रुकूँगा। लेकिन रास्तों की हालत को देखते हुए लोगों ने कहा कि उसके आगे का रास्ता अँधेरे में चलने लायक नहीं है, इसलिए कोशिश कीजिए कि मान्मा में ही रुक जाइए, वहाँ से अगले दिन निकलेंगे तो दोपहर या शाम तक आराम से रारा पहुँच जाएँगे। मुझे तो पहले यह भी नहीं पता था कि रारा पहुँचने में दो दिन लग जाएँगे। मैंने सोचा था कि शायद एक दिन में पहुँच जाऊँगा, पर लोगों ने साफ़ कहा कि एक दिन का तो रास्ता है ही नहीं, आपको दो दिन लगेंगे। तो मैंने मान्मा में ही रुकने का फैसला किया। यहाँ से रास्ता सीधे ढलान में उतरता है और फिर सीधी चढ़ाई शुरू हो जाती है, नदी के रिवर बेसिन से पहाड़ के ऊपर की तरफ। अगर मैं मीटर में बोलूँ तो यह चढ़ाई करीब 700 मीटर की ऊँचाई से शुरू होती है, फिर मोड़, मोड़, मोड़ आते रहते हैं, और आप पहाड़ी पर चढ़ते-चढ़ते लगभग 1800 मीटर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ कालीकोट जिले का मान्मा बाज़ार बसा है। आप समझ सकते हैं कि बाइक पर एक किलोमीटर की वर्टिकल चढ़ाई करनी होती है। इतना सब करने के बाद जब मैं वहाँ पहुँचा तो शाम हो ही गई थी। सुवाकोट दरबार नाम के एक होटल में मैं रात के लिए रुका। त्योहार का समय था, इसलिए वहाँ कोई और गेस्ट रुका भी नहीं था। वे लोग दीपावली की पूजा के लिए होटल खोल ही रहे थे, पर जब मैं पहुँचा तो उन्होंने कहा कि गेस्ट आया है, और मेरे लिए एक कमरे का इंतज़ाम कर दिया। खाना नहीं मिल पाया, क्योंकि उन्होंने कहा कि देखिए, हमारा किचन चालू नहीं है, स्टाफ सब छुट्टी पर है, कल सुबह ही कुछ मिल पाएगा। पर अच्छी बात यह थी कि इस बार मैं अपने घर से काफ़ी कुछ बनवाकर लेकर गया था, फ्राइड लिट्टी, सत्तू का पराठा, अचार और खाने की बाकी चीज़ें, इसलिए मैं आराम से खा पा रहा था। तो उस रात मैंने वही खाना खाया जो साथ लेकर गया था और उसी होटल में रात बिताई।
मान्मा, कालिकोट की ठंडी रात

मान्मा में रात भर बहुत ठंड लगती रही, क्योंकि यह जगह लगभग 1800 मीटर की ऊँचाई पर थी। अभी तक के रास्तों पर मैं ज़्यादा से ज़्यादा 1000 मीटर या कई बार सिर्फ़ 600 मीटर की ऊँचाई पर ही बाइक चला रहा था। अब यहाँ से आगे जो रास्ता आने वाला था, वह बहुत ऊँचा भी था, काफ़ी जोखिम भरा भी, और पूरे नेपाल की तरह यह रास्ता भी अच्छा बना हुआ नहीं था। कुछ पैचों में सड़क ठीक मिल रही थी, लेकिन ज़्यादातर सड़क टूटी हुई ही थी, इसलिए यहाँ भी मैं तेज़ नहीं चल पा रहा था। कुछ-कुछ पैचों में ही मैं अच्छे से तेज़ गाड़ी चला पाता था। ऊँचाई थी और पहाड़ पूरा खड़ी चढ़ाई वाला था, यानी खड़ी चट्टानों को काटकर बनाया गया एक पतला, संकरा रास्ता, और उस पर बाइक चलाना अपने आप में मुश्किल था।
सिंजा वैली — डॉक्टर साहब के साथ शॉर्टकट

सुबह मैं लगभग 8 बजे मान्मा से आगे के लिए निकला, और यह रास्ता मुझे बहुत अच्छा लगा। पिछले पूरे दिन मेरा कैमरा बैग में ही पड़ा रहा था, यहाँ मैंने पहली बार उसे बाहर निकाला और हेलमेट पर सेट किया, और फिर आगे बढ़ा। मान्मा से आगे पूरे रास्ते में बगल में कर्णाली नदी बहती है, और जब आप नीचे उसका दृश्य देखते हैं तो वह बहुत ही भयानक लगता है। पूरे रास्ते आपको नदी के किनारे-किनारे ही चलना होता है। फिर एक जगह पड़ती है जिसका नाम है तिला गुफा, और वहीं से सिंजा वैली शुरू होती है। लगभग सुबह 10 बजे मैं नाग्मा पहुँचा। नाग्मा एक मार्केट भी है और एक जंक्शन भी, जहाँ सभी गाड़ियाँ रुकती हैं, और यहीं से जुमला जाने वाले और मुगु की तरफ जाने वाले रास्ते अलग-अलग हो जाते हैं। मुझे क्योंकि रारा लेक जाना था, और रारा का रास्ता मुगु की तरफ है, तो मैं उसी तरफ बढ़ा। नाग्मा में मैंने रुककर लंच किया, दाल-चावल, सब्ज़ी, साग और सलाद खाया। वहाँ मुझे एक मैकेनिक भी मिला जो अवधी बोल रहा था। मुझे जानकर बड़ा अच्छा लगा कि वह बहराइच का रहने वाला था और वहाँ बाइक रिपेयरिंग का काम करता था। उससे मेरी बात हुई, उसने वहाँ के बारे में कुछ बताया और यह भी समझाया कि आगे का रास्ता कैसा होने वाला है।

नाग्मा से जब मैं आगे बढ़ा, तो थोड़ी दूर चलने के बाद मुझे लगातार ऐसा लग रहा था कि एक बाइक मेरे पीछे-पीछे चल रही है। फिर थोड़ी दूर आगे जाकर उन्होंने मुझे रोक लिया। मेरी बाइक की नंबर प्लेट पर DL लिखा हुआ था, जिससे उन्हें समझ आ रहा था कि मैं दिल्ली का हूँ। उन सज्जन ने मुझसे बात शुरू की और बताया कि मैं नेपाल आर्मी में डॉक्टर हूँ, छुट्टी पर घर जा रहा हूँ और मैं भी इसी रास्ते से जाऊँगा, तो चलिए, मैं आपको रास्ता बता देता हूँ, साथ में चलते हैं। आगे एक जगह आती है जिसका नाम है पांडव गुफा। वहाँ नदी काफ़ी धीमी हो जाती है और रास्ता भी चौड़ा है। जब सिंजा वैली शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि आप मेरे साथ चलिए और एक दूसरा रास्ता लीजिए, इससे आपकी दूरी लगभग एक घंटा कम हो जाएगी और आपका समय बचेगा। मैंने उनकी बात मान ली और उनके साथ-साथ चलने लगा। हमने एक राइट टर्न लिया और नदी के ठीक किनारे चलने लगे। जो पक्का हाईवे था, वह काफ़ी घूमकर जा रहा था, और हाईवे तो वह बस कहने के लिए था, उसकी हालत बहुत खराब थी। इसलिए मैं उनके पीछे-पीछे लग गया और नदी के किनारे एक रास्ता पकड़कर खेतों के बगल से चलने लगा। रास्ता कच्चा था, लेकिन क्योंकि वहाँ मिट्टी थी, पत्थर नहीं थे, इसलिए चलना आसान था। बीच में रुककर हमने थोड़ी बातचीत की, पानी पिया। मैंने उनसे उस जगह के बारे में पूछा, उनके बारे में भी बात की। उन्होंने बताया कि वे आर्मी से जुड़ी ट्रेनिंग के लिए कई बार भारत जा चुके हैं, कई-कई बार रहे हैं, और वहाँ के लोग उनके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं, इसलिए उन्हें भारत बहुत अच्छा लगता है। शायद यही वजह थी कि उन्होंने मेरी इतनी मदद की। उन्होंने मुझे अपने घर आने का न्योता भी दिया कि आप घर आइए, साथ में रहिए, खाना खाइए, फिर आगे जाइएगा। मैंने कहा कि कोई बात नहीं, बहुत धन्यवाद, लेकिन उनके साथ बात करके मुझे बहुत मज़ा आया, बहुत ही अच्छा लगा। जब हम उनके गाँव पहुँचे तो हमारे रास्ते अलग होने वाले थे, क्योंकि वे अपने घर जाते और मैं आगे फिर हाईवे पकड़ लेता। लेकिन वहीं सिंजा में पांडव गुफा स्कूल के पास वॉलीबॉल का मैच चल रहा था, और गाँव के पास कुछ नौजवान लड़के-लड़कियाँ म्यूज़िक चलाकर नेपाली गाने पर डांस कर रहे थे। तो उन्होंने कहा कि आप भी जाकर उसमें शामिल होइए, डांस कीजिए, मैं आपका वीडियो बनाता हूँ। उन्होंने मेरा वीडियो बनाया और मुझे बड़ा मज़ा आया, वहाँ रुककर, सबसे बात करके। फिर वहाँ से मैं अकेला ही आगे निकला और दोबारा कर्णाली हाईवे पकड़ लिया। पांडव गुफा से आगे कुछ दूर तक रास्ता ठीक रहा, पर फिर 15-20 मिनट बाद वह दोबारा खराब हो गया।
कनकासुंदरी की आंटी और शिलाजीत
इसके बाद कनकासुंदरी नगरपालिका आती है, जो सिंजा वैली में ही है। यहाँ से आगे मैं धीरे-धीरे चलने लगा। थोड़ी दूर चलने पर रास्ता बहुत खराब और बहुत सुनसान हो गया, परिदृश्य बिल्कुल बदल गया था, अब चारों तरफ बिल्कुल पत्थर ही पत्थर था। जब बीच-बीच में कोई गाड़ी आ जाती थी तब भरोसा रहता था कि मैं सही रास्ते पर जा रहा हूँ, वरना कुछ पता ही नहीं चल रहा था। एक अनजान से मोड़ पर मैंने गाड़ी रोक दी। वहाँ दो नेपाली आंटी बैठी हुई थीं। मैंने उनसे पूछा कि कुछ खाने-पीने को है क्या, तो उन्होंने मुझे पानी दिया। उनके घर में ही उनकी दुकान थी, जिसमें कुछ सामान रखकर वे बेच रही थीं। उन्होंने मुझसे पूछा, तुम सेब खाओगे? मैंने कहा, हाँ। उन्होंने 40 रुपए में करीब 5 सेब दे दिए। मैंने रख लिए, वे बहुत ही मीठे थे, और उन्हीं के खेत के थे। वे मुझे दिखा भी रही थीं कि वह देखो मेरा खेत है, वहीं से मैं सेब लेकर आई हूँ। फिर उन्होंने मुझसे चना पूछा, फिर कहा, तुम्हें कुछ और चाहिए? क्या नशे की चीज़ें? मैंने मना कर दिया। फिर उन्होंने कहा, क्या तुम्हें शिलाजीत चाहिए? वे “शिलाजू, शिलाजू” कह रही थीं। मैंने कहा कि नहीं। फिर भी मैंने पूछ लिया कि कितने का है, तो बोलीं, 5000 का। वे एक बड़ा सा गट्ठर लेकर आईं और मुझे 5000 का शिलाजीत दिखाने लगीं, जो मेरे लिए बहुत ज़्यादा था। वह कच्चा शिलाजीत था, तैयार नहीं था, और वे मुझसे कह रही थीं कि पकड़ो, इसे ले जाओ, गलाकर इस्तेमाल कर लेना। मैंने उनकी बात सुनी। मुझे पता नहीं था कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है, कैसे नहीं करना है, पर मैंने 200 रुपए का एक टुकड़ा उनसे खरीद लिया और सेब भी लिए। उनसे ढेर सारी बातें कीं, उनका वीडियो बनाया, और फिर आगे चल पड़ा। उन्होंने मुझे बताया कि आगे जाने का रास्ता इसी नदी के किनारे-किनारे है और वहाँ पहुँचने में आपको कम से कम 3 घंटे लगेंगे। उस वक़्त दोपहर के लगभग दो बज रहे थे और वे कह रही थीं कि 3 घंटे में पहुँचेंगे, यानी मैं 5 बजे से पहले तो पहुँचने वाला था नहीं। मैं उनकी बात समझ गया और आगे बढ़ा।
ऊँचे खतरनाक रास्तों से होते हुए सल्लेरी, रारा में प्रवेश
इसके बाद आगे का रास्ता भी वैसा ही था, बल्कि मुझे लगता है उससे भी ज़्यादा ऊँचाई पर और उससे भी ज़्यादा खड़ी चढ़ाई पर कटे हुए संकरे रास्तों पर मुझे चलना था, और मैं वैसे ही आगे बढ़ता गया। अब सड़क की ऊँचाई 2500 मीटर से ऊपर थी, और ज़्यादा से ज़्यादा मैंने लगभग 3400 मीटर की ऊँचाई तक के रास्ते पार किए। इतनी ऊँचाई पर गाड़ी चलाने में कई चुनौतियाँ होती हैं। पहली तो यह कि आपके शरीर को लगातार एक बेचैनी, एक डिस्कंफर्ट महसूस होता रहता है, जबकि गाड़ी चलाते हुए आपको अपना 100% ध्यान सड़क पर रखना होता है। फिर ऑक्सीजन की कमी की वजह से सिर में हल्का दर्द शुरू हो जाता है। जब रास्ते में पेड़ या झाड़ियाँ कम दिखाई दें, या सड़क के चारों तरफ बस घास हो या पथरीली ज़मीन हो, तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह जगह काफ़ी ऊँचाई पर है, और वह जगह भी बिल्कुल वैसी ही थी। कनकासुंदरी से मलिकाबोता के आगे होते हुए एक जगह बुलबुले बाज़ार और पुलिस चेकपॉइंट आता है। बुलबुले में एक होटल है और वहाँ भी गाड़ियाँ रुकती हैं। उसकी ऊँचाई लगभग 3300 मीटर है, और वह ऊँचाई इतनी ज़्यादा है कि वहाँ स्टॉपेज पर जब आप गाड़ी से उतरते हैं तो सिर में हमेशा दर्द होता है और आँखें मिचलाती हैं। कम वायुमंडलीय दाब की वजह से आपके नमकीन और बिस्किट के जितने भी पैकेट हैं, सब फूल जाते हैं। यह सब वहाँ हो रहा था और मैं समझ पा रहा था कि यह जगह काफ़ी ऊँचाई पर है, हालाँकि वहाँ कोई मार्किंग नहीं लिखी हुई थी। बाद में मैंने फ़ोन में उस जगह की ऊँचाई चेक की तो पता चला कि वह लगभग 3400 मीटर पर है, यानी लगभग केदारनाथ जैसी जगहों की ऊँचाई के बराबर, और रारा झील के पास जो मुरमा टॉप है, उसकी ऊँचाई के बराबर। मैं वहाँ ज़्यादा रुके बिना आगे बढ़ता चला गया। उसके बाद से ढलान आती है, जिसमें हमें लगातार 6-7 खड़े मोड़ लेने पड़ते हैं, और उन टर्न के बाद हम एक घाटी के किनारे-किनारे मुगु की तरफ आगे बढ़ते रहते हैं। यहाँ से झील की दूरी लगभग एक घंटे की रह जाती है। एक घंटा इसलिए, क्योंकि दूरी तो बहुत नहीं है, पर सड़क की हालत ऐसी है कि हमें धीरे चलना पड़ता है। फिर हम एक ट्राई जंक्शन पर पहुँचते हैं, जहाँ से एक रास्ता गमगड़ी की तरफ जाता है, जो मुगु जिले का जिला मुख्यालय और बाज़ार है, और दूसरा रास्ता बाईं तरफ ऊपर की ओर रारा ताल और नेशनल पार्क के लिए निकलता है। मैं बाईं तरफ मुड़ा और वहाँ से 10-15 मिनट चलने के बाद रारा ताल के एंट्री पॉइंट पर पहुँच गया।
होटल की तलाश और नए दोस्त — शैलेश और हिकमत
जब मैं शाम को वहाँ पहुँचा तो होटल को लेकर थोड़ा असहज था। मुझे लगता था कि कोई अच्छा, कम से कम ठीक-ठाक होटल मिले जिसमें मैं रुक सकूँ, जहाँ सारी सुविधाएँ हों और थकान भी मिट जाए। लेकिन जो होटल मुझे दिख रहे थे, वे या तो बहुत अच्छे नहीं थे, या इतने बंद-बंद से थे कि मुझे लगा मैं इनमें शायद ठीक से रह नहीं पाऊँगा। फ्रेश होने की व्यवस्था भी अच्छी नहीं थी, वॉशरूम बहुत छोटे थे, और कई में तो लाइट तक नहीं थी। मुझे लगा कि इतना थककर, इतनी मेहनत भरी राइड करके, इतनी दूर से आया हूँ, तो कम से कम रात तो अच्छे से बीते। मैंने दो-तीन होटलों में जाकर देखा, पर कोई पसंद नहीं आया। एक होटल मुझे ठीक लगा, मैं वहाँ गया और बात की, तो उन्होंने कहा कि अभी लाइट नहीं है, इंटरनेट भी नहीं है, और लाइट कब तक आएगी यह भी पता नहीं है, इसलिए मैं वहाँ भी नहीं रुका। मैं अभी इसी उलझन में खड़ा था कि मुझे दो छोटे बच्चे मिले, जो स्कूल जाने वाली उम्र के लग रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा कि आप चलिए, मैं आपको एक अच्छा होटल बताता हूँ, वहीं रुक जाइए, हम भी वहीं रुके हुए हैं। मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने मुझे होटल दिखाया और कहा कि कमरा 1200 नेपाली रुपए का मिलेगा। बाकी होटल सस्ते थे, 400-500 तक माँग रहे थे, लेकिन मुझे लगा कि 1200 में अगर अच्छा होटल है तो रुका जा सकता है, इसलिए मैंने 1200 नेपाली रुपए में वहीं कमरा बुक किया और रुक गया।
वे दोनों बच्चे बहुत अच्छे थे। उनसे बातचीत हुई, मैंने उन्हें जाना तो पता चला कि वे वहीं पास के एक गाँव में रहते हैं। उनमें से शैलेश सुर्खेत में पढ़ाई करता था और हिकमत उसी के गाँव का दोस्त था। हिकमत शहर जाकर नहीं पढ़ सकता था, क्योंकि उसकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति उतनी ठीक नहीं थी, पर दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे, इसलिए शैलेश जब भी गाँव आता, हिकमत के साथ ही समय बिताता। दोनों पहली बार ऊपर मुरमा टॉप जाना चाहते थे, और जब उन्हें पता चला कि मैं भी वहीं जाना चाहता हूँ, तो उन्होंने कहा कि हम भी कल आपके साथ घूमकर आएँगे। उनकी भी छुट्टियाँ खत्म होने वाली थीं, वे दीपावली की छुट्टी में घर आए हुए थे और उसके बाद उन्हें अपने-अपने स्कूलों में लौटना था। शाम को हमने वहीं बैठकर खूब बातचीत की। तब तक काठमांडू से आई हुई दो अलग-अलग पार्टियाँ भी उसी होटल में ठहरी हुई थीं, और क्योंकि मैं वहाँ अकेला भारतीय था, तो सब मुझसे बातचीत कर रहे थे और मेरा अच्छा मनोरंजन भी कर रहे थे। उन्हीं में से एक दोस्त बना जो काठमांडू से आया था, उसका नाम था रिजन थापा। वह घूमकर आ चुका था और अब आराम कर रहा था। उसने मुझे ड्रिंक ऑफर की, और हम दोनों ने खूब बातचीत की। फिर रात में एक दूसरी पार्टी भी थी, जिसमें काठमांडू से आई हुई सब औरतें और लड़कियाँ थीं, उनका एक पूरा ग्रुप एक ही गाड़ी में आया था। ये लोग भी अगले दिन सुबह रारा देखने जाने वाले थे। हमने उनसे भी बात की, फिर बोनफायर जलाया, और बोनफायर के चारों तरफ बैठकर सबका एक-दूसरे से परिचय हुआ। हमने रात का खाना खाया, खाने के बाद फिर बातें कीं और अगले दिन की योजना बनाई कि हमें रारा कैसे जाना है।

रारा जाने की सुबह — गाँव के बच्चों के साथ
फिर जब सुबह हुई तो मैं, शैलेश और हिकमत, हम तीनों एक साथ निकल पड़े। हमारी योजना थी कि हमें जल्दी निकलना है और जल्दी घूमकर वापस भी आना है, क्योंकि हमें पूरा रास्ता पैदल ही तय करना था। बाकी जो ग्रुप आए हुए थे, उनमें ज़्यादातर लोग या तो खच्चर या घोड़ों से जाने वाले थे, या उन्हें निकलने में देर हो रही थी। यही देखते हुए हम लोग सुबह जल्दी निकल गए, और निकलते ही पता चला कि नेपाल में दशहरा-दीपावली के समय उस इलाके में बच्चे, यानी जो अविवाहित युवक-युवतियाँ हैं, वे अपने-अपने गाँव में चंदा इकट्ठा करके पिकनिक पर जाते हैं। वे एक-दो दिन वहीं रहते हैं, खाना बनाते हैं, गाना गाते हैं, डांस करते हैं और खूब इंजॉय करते हैं। ऐसे ही आसपास के दो-तीन गाँवों के बच्चे इकट्ठा हुए थे, कुल मिलाकर करीब 30-40 लड़के-लड़कियों का झुंड था, और वह पूरा ग्रुप उसी होटल के एक हॉल में रुका हुआ था। वे भी सुबह-सुबह निकलने को तैयार हुए, उनके साथ खाने की चीज़ें और बनाने का सामान भी था। और उस पूरे ग्रुप में मैं, अकेला भारतीय, भी घुस गया, उनके साथ शामिल हो गया।

रारा झील का पहला दर्शन
रारा झील में प्रवेश के समय नियम यह है कि हर नेपाली पर्यटक को 100 रुपए का टिकट लेना होता है, सार्क देशों के नागरिकों या टूरिस्ट को 1500 नेपाली रुपए का टिकट लेना होता है, और अन्य विदेशियों को 3000 नेपाली रुपए का टिकट लेना होता है। वे बच्चे सभी स्थानीय गाँवों के थे, और जो जगह अब नेशनल पार्क बन गई है वह उन्हीं के गाँव की ज़मीन थी, इसलिए उनसे कोई टिकट नहीं लिया गया और उनका जाना मुफ़्त था। बस शर्त यह थी कि सारे बच्चे ज़िम्मेदारी के साथ जाएँ, कोई गंदगी न फैलाएँ, उनके पास प्लास्टिक का कोई सामान न हो और कैमरा जैसी कोई चीज़ न हो। इसके लिए सबके बैगों की जाँच हुई, और मैं भी उन्हीं के ग्रुप में शामिल हो गया। किसी को यह समझ ही नहीं आया कि मैं बाहर से आया हुआ कोई विदेशी हूँ, इसलिए मुझे एक भी पैसा नहीं देना पड़ा और मैं उनके साथ पूरी तरह घुल-मिल गया। हिकमत और शैलेश भी उन्हीं के साथ थे, तो मुझे कोई समस्या भी नहीं आई। फिर हम सब पूरे ग्रुप के साथ हँसते-गाते-बजाते चलते रहे। झील तक पहुँचने का जो ट्रैक है, वह आमतौर पर एक से डेढ़ घंटे का होता है, पर हमने उसे बहुत जल्दी पार कर लिया और घंटे भर से भी पहले रारा ताल के किनारे पहुँच गए।

फिर जैसे ही रारा की विहंगम, विशाल झील आँखों के सामने आई, मन खुशी से भर गया। इतना सुना था उसके बारे में, और वह ठीक वैसी ही थी। पर असली जादू तो अब शुरू होने वाला था। जब मैं झील के किनारे पहुँचा तब लगभग सुबह के 8 बज रहे थे, और धूप बढ़ने की वजह से पानी वाष्पीकृत होकर भाप बनकर उड़ रहा था, तो ऐसा लग रहा था जैसे पानी के ऊपर बादल बने हुए हों। जैसे-जैसे धूप पड़ती गई, वह भाप गायब होती गई, और पानी, जो सुबह की हल्की रोशनी में सलेटी रंग का दिख रहा था, धीरे-धीरे हरा होना शुरू हुआ, और हरे से धीरे-धीरे उसका रंग बदलकर नीला होता चला गया। मैं किनारे बैठकर बहुत देर तक इस पूरे नज़ारे को महसूस करता रहा, कुछ लोगों से बात करता रहा। वहाँ एक वॉच टावर बना हुआ था, मैं उस पर चढ़ा और वहाँ से वीडियो बनाए। इस पूरे समय के दौरान हिकमत और शैलेश मेरे साथ ही बने रहे। फिर मैंने पूछा कि क्या हमें उस पार भी जाना है, तो उन्होंने कहा कि हाँ, बोटिंग करते हैं, नाव से उस पार चलेंगे। उन्होंने बताया कि दो रास्ते हैं, या तो आप किनारे-किनारे पैदल चलकर भी उस तरफ जा सकते हैं, या बीच से बोट में जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो बोट चलाता है वह उनके जान-पहचान का, उनके ही गाँव का कोई व्यक्ति है, वे लोग मेरी व्यवस्था कर देंगे, और मैं भी उनके साथ चला जाऊँगा।
बोटिंग: झील पार करके मुरमा की ओर
एक बोट चली गई, दूसरी चली गई, और जब तक तीसरी बोट आई तब तक मैं फोटो खींच चुका था, और वीडियो भी बना चुका था, और झील को किनारे से खूब अच्छी तरह निहारने और महसूस करने के बाद ही बोट पर बैठा। वहाँ मैं ही अकेला भारतीय था, बाकी सब नेपाली थे, नेपाली टूरिस्ट। काठमांडू से आया हुआ एक और परिवार भी था जो उसी होटल में रुका हुआ था, उन्हीं लोगों के बीच मैं बैठा। मेरे साथ शैलेश और हिकमत भी थे, वे चप्पू चला रहे थे, और मछुआरा भी चप्पू चला रहा था। मैं एकदम पीछे बैठा था। मैंने अपना कैमरा दूसरों को दिया और उनसे अपना वीडियो भी बनवाया। हँसी-मज़ाक करते हुए, सबसे बातें करते हुए हम लोग चलते रहे। यह नेपाल की सबसे बड़ी झील है, इसकी लंबाई-चौड़ाई लगभग 4 किलोमीटर से भी ज़्यादा है, इसलिए झील पार करने में ही हमें करीब 45 मिनट से एक घंटा लग गया। इस दौरान हमने खूब बातें कीं, गाने गाए, वीडियो बनाए, और जब हम झील पार करके दूसरी तरफ पहुँचे तब लगभग दोपहर के साढ़े ग्यारह बजने वाले थे।
मुरमा टॉप की चढ़ाई और भूख की भूल
अब प्लान यह था कि जहाँ हम उस पार पहुँचे थे वहाँ एक होटल था, जिसमें खाना बनने वाला था। खाना बनता तो सभी टूरिस्ट पहले खाना खाते और उसके बाद ही ऊपर की चढ़ाई पर जाते। चढ़ाई तो उन्हें घोड़े या खच्चर से करनी थी, पर मुझे पैदल जाना था, इसलिए मैंने सोचा कि मैं पहले ही निकल जाऊँ। खाना बनने में अभी भी बहुत देर थी और हम उतना समय देना नहीं चाहते थे, क्योंकि शाम होने से पहले हमें वापस भी तो लौटना था। हमारे बैग में जो सेब, बिस्किट, फल या कोल्ड ड्रिंक रखे हुए थे, हमने सोचा कि यही खाकर हम चल पड़ेंगे। आगे चलकर हमें समझ आने वाला था कि यह हमारी एक भूल थी, जो हमें नहीं करनी चाहिए थी। हम धीरे-धीरे चलते रहे। सीधी चढ़ाई पर मुरमा टॉप दूर दिखाई दे रहा था, और मुझे वहीं तक जाना था। थोड़ी देर चलने के बाद हम रुके। मैं बाइक से आया था, रारा तक का रास्ता ज़्यादातर ढलान वाला था और चढ़ाई कम थी, फिर भी उसने मुझे बहुत थका दिया था, मेरी स्टैमिना बिल्ड नहीं हुई थी। इसलिए पहली बार जब मैं पैदल चढ़ने लगा तो थकान बहुत ज़्यादा महसूस होने लगी और मैं बुरी तरह हाँफ रहा था। वे बच्चे वहीं के रहने वाले थे, इसलिए आसानी से कूदते-फाँदते चल रहे थे। बीच में एक जगह हम रुके, हमने मिल्कशेक, फल और बिस्किट खाए और फिर आगे बढ़ने लगे। मैं पहली बार ऐसा महसूस कर रहा था कि नेपाली बच्चों के सामने मैं बहुत कमज़ोर हूँ, क्योंकि वे बहुत तेज़ भाग रहे थे। हिकमत हिम्मत के साथ बराबर मेरे साथ चल रहा था, जबकि शैलेश आगे-आगे बढ़ रहा था। जगह-जगह रुककर हम उनसे बातें करते थे, वे अपनी कहानियाँ बताते थे कि उनका स्कूल कैसा है, वे कैसे पढ़ाई करते हैं, उनका सिलेबस क्या है, वे आगे क्या करना चाहते हैं, करियर में उनके पास कितने विकल्प हैं। मैं उनके अनुभवों के माध्यम से सब कुछ बहुत करीब से समझ पा रहा था। वे भी पहली बार मुरमा टॉप पर जा रहे थे, इसलिए बहुत एक्साइटेड थे। “विस्तारे-विस्तारे”, यानी धीरे-धीरे, यह कहते हुए उन्होंने मुझे चलाया, और मैं चलता गया, और फिर थोड़ी देर बाद हम ऊपर पहुँच गए।

मुरमा टॉप — सबसे खूबसूरत नज़ारा
ऊपर पहुँचने के बाद का अनुभव इतना प्यारा था कि मैं बयान नहीं कर सकता। झील ऊपर से इतनी खूबसूरत दिखाई दे रही थी! तेज़ चटक धूप हो चुकी थी, दोपहर के करीब दो-तीन बजे होंगे, और उस समय आसमान बिल्कुल बादलों से साफ़ था। एकदम नीली रोशनी आसमान से निकल रही थी, और उसका प्रतिबिंब जब झील पर पड़ रहा था तो पानी बिल्कुल गहरा नीला हो गया था। मुरमा टॉप से मैंने झील की जो तस्वीरें ली हैं, उनमें अगर मैं थोड़ी सी भी कलर ग्रेडिंग कर दूँ तो वे बिल्कुल अनैचुरल और आर्टिफ़िशियल लगने लगेंगी, इसलिए जैसी मैंने खींची हैं, मैं उन्हें वैसी ही इस ब्लॉग में आपके साथ साझा करूँगा। उन तस्वीरों को ऊपर से देखकर ऐसा लगा जैसे प्रकृति के सारे रंग खिलखिलाकर एक साथ आ गए हों। झील का चटक नीला पानी, नीला आसमान, और बीच में कॉन्ट्रास्ट करते हुए हरे जंगल। जब हरे जंगलों का प्रतिबिंब झील किनारे की पहाड़ियों पर पड़ रहा था तो उन पर हरी छाया बन रही थी। ऐसा लग रहा था कि बीच में नीला पानी है और किनारे पर हरियाली, और जंगल और पानी के बीच एक ग्रीन ट्रांज़िशन जैसा, हरी शैडो जैसा कुछ बन रहा है, तो ऊपर से तीन-चार रंगों का पानी चमकता हुआ दिख रहा था। चारों तरफ हम दूर-दूर तक पर्वत श्रृंखलाएँ देख सकते थे, हर तरफ सफ़ेद बर्फ से ढके हुए दूर-दराज़ के पहाड़, और चीन की तरफ के पहाड़ और आख़िरी पर्वत श्रृंखलाएँ भी बिल्कुल साफ़-साफ़ दिख रही थीं। वहाँ पहुँचकर तो ऐसा लगा कि सारी थकान, सारी मेहनत जो हमने की थी, उस सबका हमें प्रतिफल मिल गया हो। बहुत देर तक हम शांति से वहीं बैठे रहे और वीडियो बनाए। कुछ टूरिस्ट थे जो चले गए, तो वह जगह बिल्कुल खाली हो गई। मैंने, शैलेश और हिकमत ने अपने-अपने वीडियो और रील बनाईं, एक-दूसरे की खूब फोटो खींचीं। उनकी एक दिलचस्पी यह भी थी कि मेरा कैमरा अच्छा है और उससे फोटो अच्छी आती हैं, तो उन्होंने कहा था कि आप अपनी फोटो हमें शेयर कीजिए। वापस जाने के बाद, अगले दिन, मैंने फेसबुक पर उन्हें फोटो भेज भी दीं। थोड़ी देर बाद वे जो नेपाली टूरिस्ट काठमांडू से आए हुए थे, उनका पूरा दल घोड़ों पर बैठकर ऊपर पहुँचा और फिर वहाँ हमारी उनसे दोबारा मुलाकात हुई। हमने थोड़ी-बहुत बातचीत की और वहाँ एक बहुत अच्छा अनुभव जिया।

शॉर्टकट में भटकना और लौटती भूख
अब हमारी वापसी का समय हो गया था। मुरमा टॉप से हमें नीचे जाना था, और इस बार हम चाहते थे कि एक नया शॉर्टकट लें, क्योंकि हिकमत और शैलेश ने बताया कि एक नया रास्ता है जिससे हम जल्दी नीचे पहुँच सकते हैं, उसमें ढलान ज़्यादा होगी पर समय कम लगेगा। इस रास्ते के लिए मैं तैयार हो गया और हम लोग नीचे उतरने लगे। तभी एक दूसरा ग्रुप भी हमें मिला जो नीचे उतर रहा था, तो हिकमत और शैलेश ने उन्हें भी सलाह दी कि आप इधर से चलिए, हम जल्दी पहुँच जाएँगे। सच बताऊँ तो उन्हें खुद इसके बारे में पूरा यकीन नहीं था, क्योंकि वे खुद भी पहली बार मुरमा टॉप पर आए थे, बस उन्हें इतना पता था कि लोग कहते हैं एक रास्ता ऐसा भी जाता है। पहाड़ों में जब कोई रास्ता कम चला जाए तो उस पर घास जम जाती है, झाड़ियाँ उग आती हैं और रास्ता दिखाई ही नहीं देता, और ठीक वैसा ही हुआ। हम उस रास्ते पर लगभग तीन बार भटके, और हिकमत और शैलेश हमें जैसे-तैसे जंगल-झाड़ियों के बीच सरकते, गिरते, बचाते हुए नीचे तक ले आए। वे दोनों इस पूरी ट्रिप के, इस एडवेंचर वाले रास्ते के, ट्रैक गाइड बने हुए थे। अब मेरी स्थिति यह थी कि मेरे लिए तो रास्ता भी नया था, लोग भी नए थे, उनकी भाषा भी, जो हालाँकि अब मुझे थोड़ी-थोड़ी समझ में आने लगी थी, फिर भी मैं काफ़ी अकेला सा महसूस कर रहा था।

उसी बीच मुझे एक नेपाली फैमिली मिली, जो रास्ते में उसी होटल की तरफ जा रही थी जहाँ मैं रुका हुआ था। तब तक मेरा खाना पूरी तरह खत्म हो चुका था, और अब मुझे बहुत तेज़ भूख लग रही थी और मैं ऐसे रास्ते में फँसा हुआ था जिससे निकलना ही एक बड़ी चुनौती थी। मैंने दिन में कुछ खाया नहीं था। सुबह मैंने मुरमा टॉप पहुँचने से पहले, लगभग 12 बजे, बीच में जो सेब, फल और बिस्किट खाए थे, सेब, जूस, बिस्किट, बस वही मेरे पेट में था, और पहाड़ों की इतनी कठिन चढ़ाई में वह मिनट भर भी नहीं टिकता, कब का खत्म हो चुका था। मेरा पेट बिल्कुल खाली था और मेरे पास पीने का पानी तक नहीं था। खाने की इतनी तेज़ भूख लग रही थी, लेकिन अब समय भी बचाना था, अँधेरा होने से पहले होटल पहुँचना था, और जंगल में हम बार-बार रास्ता भूल रहे थे। रात को लेकर अब मुझे थोड़ा टेंशन होने लगा था, पर अच्छी बात यह थी कि सब लोग साथ में थे, तो हम एक-दूसरे को सहारा देकर चल रहे थे। फिर जैसे-तैसे करते हुए, कुछ देर बाद, शाम की उस आख़िरी तेज़ धूप में, जो चेहरे पर चमक रही होती है, लगभग 5 बजे हम नीचे समतल मैदान पर पहुँच गए। यहाँ से रारा तक का रास्ता समतल था, एक नहर, यानी पानी के नाले के किनारे-किनारे चलना था, और हम उसी पर चलने लगे।
भुना चना और घोड़े की सवारी
उसी दौरान मुझे एक महिला मिलीं। मैंने उनसे कहा कि मुझे बहुत भूख लगी है, मैंने आज कुछ खाया भी नहीं है और यहाँ कुछ मिल भी नहीं रहा। उन्होंने मुझे भुना हुआ चना, चूड़ा और मूँगफली की बनी हुई नमकीन, जो वे घर से लेकर आई थीं, मुझसे साझा की। मैं उसे मुट्ठी भर-भरकर इतनी तेज़ी से फाँक रहा था जैसे मैं कितने जन्मों का भूखा हूँ। भूख के कारण मुझसे चला ही नहीं जा रहा था। मैंने बस चार-पाँच मुट्ठी खाई थी कि मेरी हालत देखकर उन्होंने कहा कि ऐसा करो, तुम इसे रख लो और आराम से खाते हुए चलते रहो। मैं उसे खाता रहा, चलता रहा, और जब अच्छे से खा लिया तो मुझे थोड़ी तृप्ति हुई। पर उसके बाद भी हमें बहुत चलना था, पूरी झील का डेढ़ चक्कर लगाना था, और यह करते-करते मैंने थोड़ा पानी भी पिया, पर मुझे समझ आ गया कि उतने से मेरी वह भूख शांत होने वाली नहीं है। जब हम रारा के बिल्कुल एक कोने पर पहुँचे, जहाँ से जंगल का रास्ता शुरू होता है और जहाँ से हमें पैदल चलकर अपने होटल पहुँचना था, तब मुझे लगा कि मुझे अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए। ठंड बहुत बढ़ चुकी थी, अँधेरा हो गया था, अब दिखाई देना बंद हो गया था, लोगों ने अपनी-अपनी टॉर्च जला ली थीं, और होटल अभी भी लगभग 40 मिनट की दूरी पर था। मैंने सोचा कि अब चढ़ाई भी है, अँधेरा भी है, ठंड भी है और मेरा पेट भी खाली है, चढ़ाई में तो यह सब और ज़्यादा महसूस होगा। तभी किस्मत से दूर से एक आख़िरी घोड़े वाला जाता हुआ दिखा। मैंने बहुत तेज़ चिल्लाकर आवाज़ लगाई, तो वह मेरे पास आया और हमारी 500 नेपाली रुपए में बात तय हुई। उसने कहा कि मैं आपको होटल तक छोड़ दूँगा। उसके भी वापस लौटने का समय हो चुका था, पर उस वक़्त वह मुझे छोड़ने के लिए तैयार हो गया। मैं घोड़े पर बैठा। पहाड़ों में कहीं भी जाकर घोड़े पर बैठने का यह मेरा पहला अनुभव था, और वह भी रारा के आख़िरी आधे घंटे में। पर उससे मुझे बहुत आराम मिला, और घोड़े ने आराम से मुझे 20-25 मिनट में होटल तक पहुँचा दिया।

बोनफायर की रात — नए साथी, नई बातें
होटल पहुँचा तो पेट में खाना नहीं था और बाहर तेज़ ठंडी, बर्फीली हवा चल रही थी, इसलिए ठंड और भी ज़्यादा लग रही थी। मैंने जल्दी से पैसे निकालकर घोड़े वाले को दिए और भागकर होटल के अंदर आया। मैंने गर्म पानी माँगा, चाय माँगी, काली चाय पी और अलाव के पास बैठ गया। मैं बैठा ही था कि काठमांडू से आया हुआ वह परिवार और लड़कियों वाला ग्रुप, इन लोगों ने मुझे बुला लिया, और हम बैठकर बातें करने लगे। जब मैं उनके पास बैठा और कपड़ों की एक और लेयर ऊपर चढ़ाई, तब मुझे अच्छा लगने लगा। चाय पी, सब लोग बोनफायर में आलू गर्म करके सेंक रहे थे, कोई नमकीन खा रहा था, कोई सलाद काट रहा था, कुछ लोग ड्रिंक बना रहे थे। उस समय जो तीन फैमिलियाँ थीं, वे अलग-अलग ट्रैक करके या रारा ताल घूमकर वापस लौटी थीं, तो सब लोग अपना-अपना कुछ सेलिब्रेशन कर रहे थे। मैं अकेला था और सबसे मेरी बात हो चुकी थी, तो सबने मुझे अपने-अपने ग्रुप में इनवाइट किया। मैंने तीन जगह से बनी ड्रिंक ली, तीन जगह से खाना लिया, कोई आलू खिला रहा है, कोई नमकीन खिला रहा है, कोई सलाद काटकर खिला रहा है, और सबसे बातें हुईं। फिर हमने उसके बाद खाना खाया। मैं उस समय अपने पूरे शबाब में था, सुरूर चढ़ा हुआ था, थोड़ा नशा था, थोड़ी ड्रिंक थी, थोड़ी ठंड लग रही थी, और सबसे बात करके इतना अच्छा लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि मैं एक ऐसी जगह पर हूँ, एक ऐसे समाज में हूँ, जो किसी पूर्वाग्रह से, किसी ऐसी मानसिकता से ग्रसित नहीं है जो औरतों, लड़कियों, बहुओं, बेटियों के साथ बैठकर शराब पीने में परहेज़ करता हो, संकोच करता हो। मुझे उस समय ऐसे समाज में रहना बहुत ही अच्छा लग रहा था। मैं अपने आप को पूरी तरह महसूस कर पा रहा था, कोई झिझक नहीं थी। ऐसा अक्सर होता नहीं है। हम अपने परिवारों में, अपने दोस्तों में भी जब ऐसे बैठते हैं तो हमेशा यह देखते रहना पड़ता है, यह महसूस करना पड़ता है कि आसपास कोई देख तो नहीं रहा, कोई हमें देखकर जज तो नहीं कर रहा, कोई हमें देखकर किसी अलग तरीके की मानसिकता तो नहीं बना रहा कि कैसे लोग हैं। वहाँ बिल्कुल भी ऐसा नहीं था, सब बड़े ही खुशमिज़ाज थे। मैं एक पिता के सामने उनकी बेटी की कमर में हाथ डालकर डांस कर रहा था और पिता भी मुस्कुरा रहे थे, बेटी भी मुस्कुरा रही थी। न मेरे मन में कोई दोषपूर्ण भावना थी, न उनके मन में। सब शराब भी पी रहे थे और हम सब बहुत खुश थे।
उसके बाद मैं फिर अपनी पहली टोली में शामिल हो गया, जहाँ लोग अभी भी बैठे बातें कर रहे थे। सबने मेरे बारे में पूछा, मैंने सबके बारे में पूछा, और सब अपने जीवन के सफ़र की कहानियाँ बताने लगे। किसी ने अपने जीवन की पूरी कहानी सुनाई। लोगों ने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ-कहाँ जा चुका हूँ, तो मैंने अपनी यात्राओं के अनुभव साझा किए। फिर रात को मैं और तीन लड़कियाँ मिलकर पीछे की तरफ स्टारगेज़िंग करने लगे। आसमान में तारे बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहे थे, आसमान पूरा क्लियर था, ठंडी हवा चल रही थी, तो सबने सोचा कि ऐसे समय को, इन तारों को, कैमरे में रिकॉर्ड किया जाए। एक लड़की ने कैमरा लगाया, और हम चार जवान लोग वहाँ बैठे बातें करते रहे। हमने सिगरेट भी जलाई, सबने सिगरेट पी, और देर रात तक बातें कीं। तीनों ही लड़कियाँ, श्वेता, बिशेषता और आभा, इतनी अच्छी थीं, इतनी प्यारी थीं और खूबसूरत भी थीं, मुझे उनके साथ बात करके बहुत अच्छा लगा। फिर यह तय हुआ कि अगले दिन का हमारा प्लान क्या है। रात होने वाली थी, अब सोने का समय आ गया था, तो सवाल यह था कि सुबह सब जल्दी निकल जाएँगे या कब निकलेंगे। अगर मैं अकेला होता तो मैं सुबह जल्दी निकलना पसंद करता, पर उन लोगों से इतनी आत्मीयता और इतना लगाव हो गया था कि मुझे लगा, मैं इन्हीं के साथ चलता हूँ। उन्होंने कहा कि अगले दिन वे तातोपानी जाएँगे, जो जुमला में है, और जुमला शहर में रुकेंगे। मैंने सोचा कि चलो, मैं भी जुमला देख लेता हूँ, इतनी ऊँचाई पर बसा हुआ एक अच्छा शहर है। और साथ ही रास्ते में जो डॉक्टर मुझे मिले थे, उन्होंने कहा था कि उनकी पोस्टिंग जुमला में है और अगर आप जुमला आएँ तो मुझसे मिलिएगा। तो मुझे एक और बहाना मिल गया कि मैं डॉक्टर से भी मिल लूँगा, और इन परिवारों के साथ एक दिन और बिताने का मौका भी मिलेगा। इसलिए सुबह साथ जाने के लिए मैंने कह दिया कि हाँ, मैं चलूँगा। मैंने उनसे बस इतना कहा था कि देखता हूँ, पर मेरा पूरा मन था कि मैं उन्हीं के साथ रहूँ, इसलिए मैंने हाँ बोल दी। और यह कहकर हम लोग अपने-अपने कमरों में चले गए, लाइट बंद की और सो गए।
वापसी की सुबह और जुमला की ओर
अगली सुबह वापस लौटने का वक़्त आ गया था। मन में एक ख़ुशी का एहसास था, एक आत्मसंतोष था, बहुत अच्छा लग रहा था कि पिछले दो दिन जिन अजनबी लोगों के साथ रहा, घूमा, सबके साथ एंजॉय किया, एक अच्छा समय बिताया, अब उन सबको अलविदा कहने का समय आ गया था। और वह होना ही था, इसलिए मैं सुबह-सुबह से ही सबसे मिलने लगा, सबको भाई बोला, हिकमत और शैलेश को बाय किया, उन्हें उनकी फोटो शेयर कीं। फिर होटल का पूरा हिसाब चुकता किया और सुबह का नाश्ता किया। दिमाग में यही चल रहा था कि मुझे बाइक से जाना है, रास्ता लंबा है, तो जल्दी निकल जाना चाहिए। किसी ने मुझे सुझाव दिया था कि रारा से बुलबुले होते हुए एक शॉर्टकट सीधे जुमला की तरफ जाता है, मुझे उससे जाना चाहिए। मन में था कि इस बार एक नया रास्ता एक्सप्लोर करूँगा, हालाँकि मुझे यह भी नहीं पता था कि उसमें कितना वक़्त लगेगा, तो मैंने सोचा थोड़ा जल्दी निकल पड़ता हूँ ताकि समय से पहुँच जाऊँ। निकलने से पहले जब हम सब अपना-अपना सामान पैक कर रहे थे, सभी को लौटना ही था, तो कुछ लोग पहले निकल गए, कुछ थोड़ा बाद में। पर जिन लड़कियों के साथ पिछली रात मैंने बातें कीं, एक अच्छा वक़्त बिताया, उनके निकलने में अभी समय था, तो मैंने जानबूझकर थोड़ी देर की, सबसे बातचीत की, और फिर कहा कि अच्छा, मैं जा रहा हूँ, पर कोशिश करूँगा कि जुमला ज़रूर आऊँ। उन्होंने कहा, ठीक है। रास्ते में जुमला जाते हुए तातोपानी पड़ता है, वे लोग वहीं रुकने वाले थे, तो मेरा भी यही प्लान बना कि पहले तातोपानी जाऊँगा, फिर जुमला। सबको बाय बोला और एक अधूरे से एहसास के साथ वहाँ से निकल पड़ा।

ढलान, ब्रेक और एक जोखिम भरा शॉर्टकट
फिर वही ढलान वाला रास्ता शुरू हुआ। जब हम पहाड़ी से नीचे की तरफ लौटते हैं तो हर थोड़ी दूरी पर ऊँचाई घटती जाती है, यानी एलिवेशन कम होता जाता है। पहले मैं करीब 3000 मीटर की ऊँचाई पर था, और जैसे-जैसे आगे बढ़ता, ऊँचाई कम होती जाती। इस दौरान बाइक के ब्रेक पर बहुत ज़्यादा ज़ोर पड़ रहा था। मैंने इंजन ब्रेकिंग की पूरी कोशिश की, पर रास्ता इतना अच्छा नहीं था कि सिर्फ़ इंजन के भरोसे नीचे उतरा जा सके, तो उस उबड़-खाबड़, पथरीले, मिट्टी भरे और तीखे ढलान वाले रास्ते पर मुझे ब्रेक लगाना ही पड़ता था, और अगले-पिछले दोनों में से पिछला ब्रेक ज़्यादा लग रहा था। फिर मैं बुलबुले पहुँचा, जो इस पूरे रास्ते का सबसे ऊँचा स्थान था, और वहाँ से एक रास्ता नीचे की तरफ जाता है जो जुमला का शॉर्टकट था। अगर पहाड़ों में या नेपाल में कोई आपसे कहे कि यह शॉर्टकट है, तो मेरी सलाह यही है कि उसके बारे में एक-दो लोगों से और पूछ लीजिए और यह मानकर चलिए कि वह रास्ता इतना अच्छा नहीं होगा। यह सब मुझे भी पता था, फिर भी मैंने रिस्क लेना चाहा। जैसे ही मैं उस रास्ते पर बढ़ा, वह बहुत शार्प ढलान की तरफ नीचे जा रहा था, करीब 3400 मीटर की ऊँचाई से लगभग 2800 मीटर तक। अगले 10 मिनट में मैं नीचे उतरने वाला था, और उसके बाद एक छोटा सा गाँव पड़ता है, बुमरा, माडी चोर होते हुए रास्ता आगे बढ़ता है। यह रास्ता इतना उतार-चढ़ाव भरा और इतना जोखिम भरा था कि पूरा बना भी नहीं था, और जो बना भी था वह पथरीला था। कहीं-कहीं पक्की सड़क बन रही थी, पर उसकी वजह से गिट्टी और पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े भरे पड़े थे जो फिसलन को और बढ़ा रहे थे। एक तीखी ढलान पर बजरी बिछी हो, उस पर बाइक चलाना कितना मुश्किल होता है, यह कल्पना कीजिए। मैं लगातार ब्रेक दबा रहा था। पूरा रास्ता बाकी सारे रास्तों से ज़्यादा सुनसान था, उस पर कोई नहीं चल रहा था। फिर भी धीरे-धीरे करते हुए मैं बुलबुले के आगे करीब एक घंटे तक उस शॉर्टकट पर चलता रहा।
फिर एक वक़्त ऐसा आया जब मेरी बाइक को एक ऐसे तीखे ढलान से गुज़रना था जिस पर सिर्फ़ उबड़-खाबड़ पत्थर पड़े थे, बजरी नहीं। उस तेज़ ढलान पर एक-डेढ़ क्विंटल की बाइक, सामान के साथ, और उसका पिछला ब्रेक ठीक से लग नहीं रहा था। यहाँ बताना भूल गया, बार-बार ढलान पर ब्रेक लगने की वजह से उनमें एयर बन गई थी और ब्रेक लगने बंद हो गए थे। सोचिए, पिछला ब्रेक न लगे तो आप कैसे आगे बढ़ सकते हैं। उस जगह मैं करीब आधे घंटे रुका रहा, सोचता रहा कि अब क्या करूँ। बिना ब्रेक के गाड़ी नहीं चलाई जा सकती, वह भी एक ऐसे रास्ते पर जिसके बारे में कुछ पता ही नहीं है। अब मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। मैंने सोचा, भले ही ज़्यादा समय लगे, लंबे रास्ते से ही जाऊँगा, वापस नाग्मा जाऊँगा और वहाँ से हाईवे पकड़कर जुमला जाने की कोशिश करूँगा, भले ही शाम हो जाए। मैंने वही किया, पर जितना एक घंटा मैं आगे जा चुका था, उतना ही रास्ता वापस भी पार करना था, और जितनी ढलान उतरा था उतनी ही अब चढ़नी थी। बिना ब्रेक के चढ़ाई करना आसान होता है, पर ढलान पर हमेशा वही दिक़्क़त आती है, तो जहाँ-जहाँ ढलान आती, मैं पैरों के सहारे, अगले ब्रेक के सहारे और पहले गियर में बाइक को धीरे-धीरे लुढ़काते हुए आगे बढ़ता रहा। किसी से पूछा कि मैकेनिक की दुकान कहाँ मिलेगी, तो लोगों ने बताया कि करीब आधा घंटा पीछे जाने पर मिलेगी। वहीं पहुँचा जहाँ से मैंने यात्रा शुरू की थी, एक मैकेनिक से बात की, उसने किसी दूसरे मैकेनिक को बुलाया, इसमें करीब एक घंटा ज़ाया हुआ, उसने पिछले ब्रेक से कुछ हवा निकाली और उसे ठीक किया। ब्रेक दोबारा लगने लगे। उसने सलाह भी दी कि इस रास्ते पर जाना ठीक नहीं है, मेन रोड से ही जाइए, शॉर्टकट रिस्की हो सकता है। मैंने उसकी बात मान ली और मेन हाईवे पर ही चलना जारी रखा। अब तक काफ़ी दिन बीत चुका था, करीब दोपहर हो गई थी। एक घंटा जाने में, एक घंटा वापस आने में, और आधा घंटा मैकेनिक के पास बैठने में, यानी कुल दो घंटे से ज़्यादा का समय बेकार हो चुका था। अब बस एक ही रास्ता बचा था, शाम होने से पहले किसी तरह जुमला पहुँच जाऊँ, क्योंकि उससे पहले और मैं कहीं जा भी नहीं सकता था। फिर मैं वापस बुलबुले चौक, चेकपोस्ट पर आया और वहाँ से धीरे-धीरे फिर से बाइक बढ़ाने लगा।
घबराहट से उबरना और नाग्मा वापसी
यहाँ एक बात और बता देना चाहता हूँ, मेरी बाइक इस दौरान दो बार धीरे-धीरे बजरी पर फिसलकर गिर गई। जब आप ऐसे खतरनाक रास्तों पर हों, जहाँ एक तरफ इतनी गहरी खाई हो, तो एक छोटी सी गलती भी जान ले सकती है, और ऐसे में आपका सबसे भरोसेमंद साथी आपकी बाइक होती है, जिसके हर पुर्जे पर, हर ब्रेक पर, क्लच पर, एक्सेलरेटर पर पूरा भरोसा होता है कि अगर मैं दबाऊँगा तो यह काम करेगी। पर मान लीजिए अगले दो घंटे तक आपके ब्रेक लगातार फेल हो रहे हों, पैर दबाने पर भी काम न करें, तो एक अजीब सी घबराहट होती है, बेचैनी होती है, यह नहीं पता होता कि वे सच में काम करेंगे या नहीं। यही ख़याल मेरे मन में बार-बार आ रहा था। ब्रेक बन जाने के बावजूद, अगले घंटे भर का वह अनुभव मुझे बार-बार आँखों के सामने याद आ रहा था, इसलिए मैं भरोसे के साथ ब्रेक नहीं लगा रहा था। मुझे डर लगता था कि कहीं तेज़ चलूँ और ब्रेक न लगे तो गिर सकता हूँ। इस भावना से उबरने में मुझे अगले करीब एक से डेढ़ घंटे लगे। तब जाकर मैंने ठीक से ब्रेक लगाना शुरू किया, ब्रेक अब काम कर रहे थे, फिर भी मैं कोशिश करता कि कम से कम ब्रेक लगाऊँ और इंजन ब्रेकिंग पर ज़्यादा निर्भर रहूँ। फिर मैं लगातार चलता रहा और कनकासुंदरी, पांडव गुफा, नदी के रास्ते, जो डॉक्टर साहब ने शॉर्टकट बताया था, उसी को फॉलो करते हुए थोड़ा समय बचाते हुए जल्दी ही नाग्मा शाम के 4 बजे तक पहुँच गया। वहाँ मैंने बाइक में कुछ 3-4 लीटर पेट्रोल भरवाया, क्योंकि पेट्रोल कम हो गया था और मुझे था कि जुमला में फ्यूल स्टेशन मिलेगा। वहाँ से जुमला की तरफ निकल पड़ा।
जुमला में दोस्तों की तलाश
जुमला जाते हुए मैं बार-बार यही सोच रहा था कि क्या वे लोग मुझे आज वापस मिलेंगे। सच बताऊँ तो श्वेता मुझे बहुत अच्छी लगती थी, उससे बात करना मुझे बहुत अच्छा लगता था, मुझे उससे एक आत्मीय सा लगाव हो गया था। मुझे पता था कि यह बस दो दिन का ही मिलन है, पर कभी-कभी ऐसा होता है कि आप किसी अजनबी से इतना जुड़ जाते हैं कि उसके साथ और वक़्त बिताने का मन करता है। यही भावना मुझे बार-बार उस तरफ खींचे जा रही थी जहाँ उन्होंने बताया था कि वे जाएँगे। उन्होंने बस इतना कहा था कि वे जुमला जाएँगे, और जुमला भी एक अच्छा-खासा शहर है, तो वे कहाँ जाएँगे, कहाँ रुकेंगे, मुझे इसका कोई अंदाज़ा नहीं था, न मेरे पास उनका कोई फ़ोन नंबर था कि बात कर सकूँ। मैंने यह भी नहीं कहा था कि मैं आना चाहता हूँ, बस इतना कहा था कि देखूँगा, जबकि मन में भले ही कुछ और था, पर कम ज़ाहिर करने के लिए यही कहा था। पहले उन्होंने बताया था कि वे तातोपानी जाएँगे, जो जुमला के रास्ते पर, जुमला शहर से करीब 5-7 किलोमीटर पहले एक गर्म पानी का स्रोत है, जहाँ लोग नहाते हैं। तो पहले मैं तातोपानी पर जाकर रुका, वहाँ बहुत देर इधर-उधर खोजता रहा, मुझे भरोसा था कि शायद वे लोग वहीं दिख जाएँगे, पर काफ़ी मशक्कत और घूमने के बाद भी कोई नहीं दिखा, तो यकीन हो गया कि शायद या तो वे लोग वहाँ पहुँचे ही नहीं, या आगे निकल चुके हैं। कुछ समय बिताने के बाद मैंने वापस जुमला की तरफ बढ़ना शुरू किया, तब तक अँधेरा होने लगा था। जुमला शहर का परिदृश्य बिल्कुल अलग है, जुमला एक चौड़ी घाटी में बसा है, जहाँ खूब सारी धान की खेती होती है और सीढ़ीदार खेत बने हुए हैं, दूर से देखने पर एक बहुत खूबसूरत सा पैटर्न दिखता है। यह सब देखते हुए मैं आगे बढ़ता रहा, पर मन ही मन एक इच्छा थी, एक चाह थी कि काश एक बार और उनसे मिल पाता। यही सोचते हुए मैं आगे बढ़ता गया, मेरी नज़र सड़क पर कम और चारों तरफ ज़्यादा थी। मेरे दिमाग में उनकी गाड़ी की तस्वीर बनी हुई थी, काठमांडू की, बागमती प्रदेश की नंबर प्लेट वाली, सफ़ेद रंग की स्कॉर्पियो, और मैं उसे ही चारों तरफ खोज रहा था। पहाड़ों में ऐसे शहरों में जो बसावट होती है, वह ज़्यादातर लीनियर होती है, तो मुझे उम्मीद थी कि मेन मार्केट और अच्छे होटल मेन रोड के आस-पास ही होंगे। मैं उसी सड़क पर चलता गया, दाएँ-बाएँ लगातार नज़र घुमाता रहा कि कहीं वह गाड़ी दिख जाए, कहीं उनका ड्राइवर या उनकी टीम का कोई सदस्य दिख जाए। इसी उम्मीद में मैं लगभग पूरा जुमला शहर पार कर चुका था, तभी अचानक मुझे वही गाड़ी दिख गई जिसका इंतज़ार मैं तब से कर रहा था। अब मेरी फितरत देखिए, मन तो यही कह रहा था कि मैं जाऊँ, उनके पास गाड़ी लगाऊँ और कहूँ कि मैं आ गया, पर सुबह मैंने यही कहा था कि देखूँगा, मन करेगा तो जाऊँगा वरना नहीं। इस भावना ने मुझे रोक लिया, और मैंने थोड़ा आगे जाकर अपनी गाड़ी रोक ली। दूर से उन्हें देखता रहा, मन ही मन बहुत खुश था, खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। सोचता रहा कि क्या कहूँ, कैसे जाऊँ। वे लोग एक होटल के सामने रुके थे, गाड़ी से उतरकर सामान निकाल रहे थे, कुछ लोग रिसेप्शन पर थे, कुछ सामान लेकर कमरों की तरफ जा रहे थे। दूर से यह देखकर मैंने बाइक मोड़ी और उनके बगल से निकलने का नाटक करने लगा, और जैसे ही निकल रहा था, श्वेता की माँ ने मुझे देख लिया। मैंने भी उन्हें देखा और हाथ से हाय किया, फिर बाइक उनकी तरफ मोड़ ली, क्योंकि अब आँखें मिल चुकी थीं और उन्हें पता चल गया था कि मैंने उन्हें देख लिया है। मैं उनके पास गया, हम सबने एक-दूसरे को हाय किया और मैंने कहा, अरे, आप लोग यहाँ, कैसे मुझे फिर से मिल गए! मैंने ऐसा दिखाया जैसे हम संयोगवश मिले हों, पर सच्चाई यह थी कि मैं मन ही मन यही चाहता था, मैं उन्हें खोज ही रहा था।

होटल में दोबारा मुलाकात और आख़िरी शाम
सबसे मिलने के बाद मैं बहुत खुश था। अब मुझे भी उसी होटल में रुकना था, तो आंटी ने कहा कि तुम भी हमारे फ्लोर पर कोई कमरा देख लो, मैं बात करती हूँ, सस्ते में दे देंगे, होटल वाला उनका जान-पहचान का ही था। हम सब साथ रिसेप्शन पर गए, वे लोग ऊपर के तीन कमरों में रुके, और मुझे उन्हीं के बगल का कमरा दे दिया गया। थोड़े इंतज़ार के बाद मुझे कमरे की चाबी मिली, 1000 नेपाली रुपए किराए पर। मैं अपना सामान रखकर फ्रेश हुआ, कपड़े बदले, हाथ-मुँह धोए और फिर हम सब नीचे रेस्टोरेंट एरिया में इकट्ठा हुए। पहली बार मुझे किसी रेस्टोरेंट में खाना देर से आने पर बुरा नहीं लगा, बल्कि अच्छा लगा, क्योंकि जितनी देर खाने में लगती, उतना ही और वक़्त मिल जाता। न जाने क्यों उस रात रेस्टोरेंट में हर चीज़ बहुत धीरे बन रही थी। खाने की टेबल पर उनका आठ लोगों का ग्रुप था, एक ड्राइवर, और मैं, कुल दस लोग। ड्राइवर और मैं एक तरफ बैठे थे, बाकी सब दूसरी तरफ, पर हम सब एक-दूसरे को देखकर बातें कर पा रहे थे। खाना आने तक मैंने और ड्राइवर ने अपने लिए दो पेग ड्रिंक ऑर्डर की, साथ में नमकीन, मूँगफली और सलाद मँगवाया। हम बातें करते रहे, खाते रहे, हँसी-मज़ाक करते रहे, फिर जब खाना आया तो हमने खाया, बहुत स्वादिष्ट था। खाने के बाद हम सब रोड पर थोड़ी वॉक करने निकले, रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे और हवा बहुत ठंडी चल रही थी। जुमला लगभग 2500 मीटर की ऊँचाई पर बसा एक घाटीनुमा शहर है, चारों तरफ बर्फ से ढके ऊँचे पहाड़ों के बीच, और वहाँ की ठंड बयान नहीं की जा सकती। वह हवा बिल्कुल सूखी थी और शरीर को चुभने जैसी लग रही थी, हाथ ठंडे हो रहे थे। ऊपर से दिन भर बाइक चलाने की थकान से मुझे नींद भी आ रही थी, आँखें लाल हो रही थीं। श्वेता ने कहा, तुम्हारी आँखें लाल हो रही हैं, अब सो जाओ, पर मेरा मन नहीं कर रहा था वहाँ से जाने का। मैं सबसे बातें कर रहा था, तभी सबने कहा, चलो ऊपर चलते हैं। सब एक ही फ्लोर पर एक लाइन में रुके थे, मेरा कमरा सबसे पहले पड़ता था, आगे बाकी सबके कमरे थे। उन्होंने कहा कि हम रात में सोने वाले नहीं हैं, बातें करेंगे, गेम्स खेलेंगे, तुम भी चलो। मैं तो यही चाहता था, बहुत खुश था। मैंने जैसे ही उधर जाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाया, उसी वक़्त दूसरी लड़की की माँ ने कह दिया, कोई बात नहीं, अब सो जाते हैं, बहुत देर हो गई है। एकाएक मुझे बहुत झटका सा लगा, मैं बिल्कुल रुक गया, जो मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया में खोया हुआ था, सब कुछ अच्छा-अच्छा होता दिख रहा था, अचानक उस पर ब्रेक लग गया। तभी मुझे समझ आने लगा कि शायद मैं कुछ ज़्यादा ही करीब जाने की कोशिश कर रहा हूँ। आख़िर वे लोग अपने ग्रुप में, अपनों में ही खुश हैं, मैं उनका सगा भी तो नहीं हूँ, बस रास्ते में मिला हुआ एक मुसाफिर हूँ, जो संयोगवश दो बार उनसे मिल गया, एक बार उस होटल में जहाँ वे रुके थे, और दूसरी बार आज, कम से कम दिखावे में तो यही था, उनकी नज़र में तो यही था। मुझे इस बात का थोड़ा बुरा लगा, पर मन में कोई शिकायत नहीं थी, मुझे वास्तविकता पता ही थी कि यही तो होना है, आज की रात ही आख़िरी रात है, इसके आगे मुझे अपने रास्ते जाना ही है, फिर पता नहीं कब, किससे, कहाँ मुलाकात होगी। पर एक उम्मीद थी, एक सहारा था, मैंने सबसे बातचीत में उनकी इंस्टाग्राम और फेसबुक आईडी ले ली थी, जिससे कम से कम उनके संपर्क में तो रह ही सकता था। मन मसोसकर, एक स्माइल के साथ मैंने आंटी की तरफ देखा और कहा, ठीक है, चलिए, मैं भी सोने जा रहा हूँ, वैसे भी मेरा मन नहीं है। सबको गुड नाइट बोलकर मैं अपने कमरे में आ गया, बिस्तर पर लेटते ही थोड़ी देर में आँख लग गई, मुझे पता ही नहीं चला और मैं सो गया।
आख़िरी सुबह — चंदननाथ मंदिर और अंतिम विदाई

सुबह जब आँख खुली तो करीब 5 बज रहे थे, हल्का-हल्का उजाला होने लगा था। मुझे पता था कि अब उठकर आगे जाने की तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि रास्ता बहुत लंबा था, पूरे दिन चलकर भी शायद ही मैं नेपालगंज-सुर्खेत तक पहुँच पाता। इसी सोच के साथ मैं उठा, कपड़े पैक किए, फ्रेश हुआ और सामान बाँधने के लिए बाइक के पास बाहर निकला। देखा कि श्वेता की मम्मी सुबह ही उठकर बाहर पार्क में वॉक कर रही थीं, मैंने उन्हें नमस्ते किया, थोड़ी देर बात की। फिर बाइक पर सामान बाँधने लगा, रात में सीट पर पानी की बूँदें गिरी थीं जो ठंड की वजह से जम गई थीं, क्योंकि रात का तापमान माइनस 4 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। मैंने उन जमी हुई बूँदों को रगड़-रगड़ कर छुड़ाया और फिर सामान बाँधा। उनसे थोड़ी बातें कीं और कहा कि ठीक है, मैं चलता हूँ, मुझे एक दोस्त से मिलना है। फिर मैंने उन डॉक्टर साहब को फ़ोन किया जो रास्ते में मिले थे, पूछा कि अगर फुरसत हो तो थोड़ी देर मिल लेते हैं। उन्होंने फ़ौरन हाँ कहा और बुला लिया, कहा कि साथ में चंदननाथ मंदिर घूमेंगे और नाश्ता करके फिर आप निकल जाइएगा। मैं उनसे मिलने चला गया, वहाँ पहुँचा तो उन्होंने ख़ुद ही मेरी बाइक चलानी शुरू कर दी, मैं पीछे बैठा। उन्होंने मुझे चंदननाथ मंदिर के अंदर दर्शन कराए, फिर एक बहुत खूबसूरत लोकेशन में, एक छोटे से होटल की पहली मंज़िल की बालकनी में बैठकर हमने चाय और समोसा, छोले-समोसे और एक कप चाय पी। उस जगह का नज़ारा बयान करना मुश्किल है, सुबह के 7-8 बज रहे थे, पहाड़ों की ठंड में से छनकर आती धूप बिल्कुल आँखों पर पड़ रही थी, और उसी को फेस करते हुए हम बालकनी में बैठे सुबह-सुबह चाय-समोसा खा रहे थे। आज भी उस पल को याद करके मैं बहुत खुश हो जाता हूँ, वह एहसास अपने आप में बहुत अनोखा था। बहुत देर तक वहाँ बैठकर जलेबी-सी कोई चीज़ खाई, फिर उन्होंने कहा कि चलो, बाइक लेकर ऊपर गुम्बा चलते हैं, वहाँ एक बौद्ध स्तूप है, वहाँ से पूरा जुमला शहर साफ़ और बहुत प्यारा दिखता है। हम दोनों निकले, वे बाइक चला रहे थे, मैं पीछे बैठा था। गुम्बा पर हमने वीडियो बनाए, एक-दूसरे की फोटो लीं, कुछ बातें कीं। फिर लगा कि अब मुझे निकलना चाहिए, रास्ता काफ़ी लंबा था। वापस चंदननाथ मंदिर के पास पहुँचा जहाँ उनकी बाइक खड़ी थी, उन्हें वहाँ ड्रॉप किया, और मैं जैसे ही निकलने ही वाला था कि देखा, वे सारी औरतें और लड़कियाँ भी वापस चंदननाथ मंदिर पर दर्शन करने आई हुई थीं। यह हमारी आख़िरी मुलाकात होने वाली थी, जिसके बाद हम हमेशा के लिए बिछड़ने वाले थे। सुबह जब मैं होटल से निकला था तो मन में था कि शायद मैं ठीक से किसी को बाय भी नहीं कह पाया, रात को सब सो गए और अगली सुबह सब निकल गए। मन में एक चाह थी कि काश वे लोग सुबह दर्शन करने आएँ और उनसे एक आख़िरी बार मुलाकात हो जाए। सच बताऊँ तो वैसा ही हुआ। मैं वापस लौट रहा था, डॉक्टर साहब अपनी बाइक लेकर जा रहे थे, तभी वे सब लोग एक बार फिर मिल गए। मैं इस आख़िरी मुलाकात को अच्छे से अपने कैमरे में कैद करना चाहता था, इसलिए सबके साथ हँसी-मज़ाक किया, ग्रुप फोटो ली, सबको बाय किया, गले लगाया, और उसके बाद वहाँ से चल पड़ा। मन में एक संतोष था कि यात्रा बहुत अच्छी रही, और एक हल्का सा दुख भी कि पता नहीं कभी फिर मिल पाएँगे या नहीं। इसी भाव के साथ मैंने बाइक स्टार्ट की और वापस इंडिया की तरफ, नेपालगंज के लिए निकल पड़ा।

घर की ओर — बाइक की टूट-फूट और बाघ की खबर
जुमला शहर में ही मैंने बाइक की टंकी फुल कराई, और करीब सुबह 9 बजे वहाँ से चला। जुमला से सुबह-सुबह नदी के किनारे, जुमला घाटी के खेतों को देखते हुए पूरी रफ़्तार में आगे बढ़ा, वह नज़ारा आज भी मेरे दिमाग में पूरी तरह कैद है, बहुत ही खूबसूरत दृश्य था। फिर पूरे दिन उन्हीं पथरीले रास्तों से होते हुए बाइक चलाता रहा, उन्हीं आंटी के घर के बगल से दोबारा गुज़रा, पर इस बार आंटी नहीं थीं। मैंने वही शॉर्टकट लिया जो डॉक्टर साहब ने बताया था, और उसी रास्ते से वापस मान्मा पहुँचा, दोपहर के करीब दो बज गए थे। मान्मा से वापस दैलेख होते हुए, राकम कर्णाली पार करते हुए जब मैं आगे बढ़ रहा था, वह ढलान भरा रास्ता जहाँ खत्म होता है और आगे रास्ता थोड़ा ठीक होना शुरू होता है, उससे ठीक पहले, इतनी ऑफ़-रोडिंग करने के बाद मेरी बाइक के पुर्जे-पुर्जे ढीले हो गए थे। साइलेंसर बार-बार आवाज़ दे रहा था, जैसे उसके सारे पुर्जे हिल गए हों। जब मैंने बाइक किनारे लगाकर देखा, तो दूसरे गियर में चलने और लगातार ब्रेक लगने और पथरीले रास्ते पर झटके खाने की वजह से टैंक एकदम लाल हो गया था, और साइलेंसर के चार नट निकलकर गिर चुके थे, और मुझे पता भी नहीं चला था। मुझे तो बस वापस लौटने की जल्दी थी, दिमाग में यही लक्ष्य था कि शाम तक अगर नेपालगंज पहुँच गया तो आज ही बॉर्डर पार करके इंडिया निकल जाऊँगा। पर संयोग को यह मंज़ूर नहीं था। बाइक के सारे पुर्जे ढीले देखकर मैंने किसी से पूछा कि मैकेनिक की दुकान कहाँ मिलेगी, लोगों ने कुछ बताया, वहाँ पहुँचा तो दुकान बंद थी, फिर आगे गया, वहाँ भी बंद, तकरीबन 10 किलोमीटर आगे जाकर एक दुकान मिली। मैं बहुत धीरे-धीरे चलते हुए वहाँ पहुँचा, एक लड़का था, उसने मेरी बाइक के सारे बोल्ट कसे, चेन में ऑयलिंग की, ब्रेक चेक किए, फिर कहा कि ठीक है, थोड़ा ठंडा कर दीजिए। मैं फिर आगे निकला। अब लगभग शाम हो चुकी थी, अँधेरा होने के कगार पर था। मुझे समझ आ गया था कि अब कहीं बीच में ही रुकना पड़ेगा। सुर्खेत और दैलेख के बीच कहीं मैं था, तो रुकने की कोई बहुत अच्छी जगह नहीं मिल रही थी। अच्छी बात यह थी कि रास्ता अब थोड़ा ठीक हो गया था, पथरीला और ऑफ़-रोडिंग वाला नहीं रह गया था। चलते-चलते बीच में एक अनजान सा होटल मिला जहाँ कुछ गाड़ियाँ रुकी हुई थीं, वहाँ मैं रुका, रात के करीब 7-8 बज रहे होंगे, पूरा अँधेरा हो चुका था। सड़क पर जब कोई गाड़ी निकलती तो उसकी रोशनी में थोड़ा-बहुत दिखाई देता, वरना मैं अकेला ही चल रहा था।
उस होटल पर रुककर मैंने सोचा, थोड़ा आराम कर लूँ, चाय पी लूँ, पानी पी लूँ, मुँह धो लूँ। तभी किसी को बात करते सुना कि चार दिन पहले यहाँ, पहाड़ी के जंगल में होटल के पास, एक बाघ आया हुआ था, और उनका कहना था कि अकेले जाना सुरक्षित नहीं है, कोशिश करें कि कोई और बाइक वाला जा रहा हो तो उसके साथ ही निकलें। मैं थोड़ा इंतज़ार कर ही रहा था कि एक और बाइक वाला आया, जो मान्मा से सुर्खेत जा रहा था, उसके साथ उसकी बहन बैठी थी। हमारी बात हुई, तय हुआ कि हम दोनों साथ में, आगे-पीछे बारी-बारी से चलेंगे। उसकी बाइक की लाइट बहुत अच्छी नहीं थी और मेरे बुलेट की लाइट तेज़ थी, तो मेरी लाइट से उसे अच्छे से रास्ता दिखता, इसलिए मैंने कहा कि मैं आगे चलूँगा, तुम पीछे चलना, और स्पीड लगातार मेंटेन रखेंगे ताकि समय से सुर्खेत पहुँच सकें। मैं सुर्खेत से करीब 60 किलोमीटर पहले था, तो जंगल में अकेले, दो लोगों को मिलकर यह 60 किलोमीटर लगातार तय करना था, क्योंकि अगर सुर्खेत पहुँचने में देर होती तो शायद वहाँ भी होटल न मिलते या बंद हो जाते। यही सोचकर हमने ज़्यादा वक़्त गँवाए बिना वहाँ से चलना शुरू किया। मैं आगे चल रहा था, सड़क पूरी जंगल के बीच से जाती थी, कुछ भी दिखाई नहीं देता था, एक तरफ हमेशा एक गहरी खाई थी और रास्ता लगातार घुमावदार था, तो हम ज़्यादा स्पीड भी नहीं कर सकते थे, लगातार मुड़ते हुए चल रहे थे। साथ वाले लड़के की बहन को बार-बार उल्टियाँ आ रही थीं, क्योंकि उसे घुमावदार रास्तों पर चक्कर आ रहा था, इसलिए हम रफ़्तार धीमी ही रखने की कोशिश कर रहे थे। फिर भी करते-करते हम बड्डीचौर पहुँचे, वहाँ एक ब्रेक लिया, और वहाँ से लगभग आधा घंटा और चलने के बाद सुर्खेत पहुँच गए। मुझे याद है, तब रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे, और सुर्खेत का पूरा बाज़ार लगभग बंद हो चुका था, सारी दुकानें बंद थीं, कुछ छोटे-मोटे ठेले-खोमचे वाले और एक-दो रेस्टोरेंट खुले थे, जो कभी भी बंद हो सकते थे। मैंने एक होटल देखा, कमरा बुक किया, सामान रखा, पूछा कि कुछ खाने को मिलेगा क्या, तो उन्होंने कहा कि अब खाना नहीं बन पाएगा, काफ़ी देर हो गई है। तो मैं बगल के एक रेस्टोरेंट से खाना ले आया और खाकर सो गया।
सुर्खेत से वापसी और यात्रा का अंत
इस बार जब मैं जुमला से सुर्खेत की तरफ वापस जा रहा था, तो पूरे रास्ते मन में एक ही ख़याल घूम रहा था, क्या सच में यह हमारी आख़िरी मुलाकात थी, या एक बार और मिलेंगे। मैं श्वेता से, उनकी पूरी फैमिली से, पूरे ग्रुप से, एक आख़िरी बार और मिलना चाहता था। पर मुझे पता था कि मैं उनसे पहले निकल गया था, बाइक पर हूँ तो जल्दी पहुँच जाऊँगा, फिर भी मन में यह ख़याल था कि अगर मैं रात के 10 बजे यहाँ पहुँचा हूँ तो वे लोग कब तक पहुँचेंगे। इसी ख़याल में मैं रुक गया, और रात में बारिश भी शुरू हो गई। मैं सो गया। सुबह उठा, सामान बाँधा तो देखा, पूरे सुर्खेत में बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। इतनी बारिश में अगर निकलता तो पूरी तरह भीग जाता, सड़कें फिसलन भरी होतीं, यही सोचकर मैंने पास की एक दुकान से पन्नी ली, अपना पूरा सामान पॉलिथीन में बाँधा और दो रेनकोट खरीदे, एक ऊपर के लिए और एक नीचे की बॉडी को कवर करने के लिए। सोचा कि इतनी तैयारी के साथ चलूँगा तो शायद आज घर तक भी पहुँच सकता हूँ। यह सब सामान बाँध ही रहा था कि अचानक फिर वही सफ़ेद स्कॉर्पियो दिखी, जिसमें वे सब आए थे, पर इस बार गाड़ी खाली थी, बस ड्राइवर बैठा हुआ था, और मेरे सामने से निकल गया। इससे मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे लोग सुर्खेत में ही रात को रुके हुए हैं। मैंने बाइक स्टार्ट की, पर जब तक मैं सामान बाँधकर आगे बढ़ा, तब तक वह ड्राइवर कहाँ चला गया, पता ही नहीं चला। मन में बार-बार यह ख़याल आ रहा था कि शायद एक बार और हम किसी रास्ते पर टकरा जाएँ, पर दिन में एक बेचैनी भी थी, घर भी पहुँचना था। कितनी बार मिलूँगा, बार-बार मिलने का मौका खोजने से कहीं उन्हें यह न लगने लगे कि मैं उनका पीछा कर रहा हूँ। इस तरह के किसी भी गलत प्रभाव से बचने के लिए मैंने यह इरादा छोड़ दिया कि उनसे मिलना है। सुबह नाश्ता किया और वहाँ से निकल पड़ा।
वापस आते हुए सुर्खेत से जब मैं हर्रे पहुँचा, तो बारिश के बाद वहाँ घाटी का बहुत खूबसूरत दृश्य दोनों तरफ़ दिख रहा था। वहाँ फोटो लिए, वीडियो बनाया, चाय पी, कुछ लोगों से बातें कीं और फ़ोन को इंटरनेट से जोड़ा। इंस्टाग्राम पर मैंने श्वेता को मैसेज किया, पूछा कि कहाँ पहुँचे, कब रुके थे। बातचीत से पता चला कि वे लोग रात को देर से, करीब 1 बजे सुर्खेत पहुँचे थे, तब बारिश हो रही थी, अभी भी उसी होटल में रुके हुए हैं, निकलने में उन्हें वक़्त लगेगा। श्वेता को नेपालगंज जाना था, वहाँ से फ्लाइट लेकर सीधे काठमांडू, उसे ऑफ़िस ज्वाइन करना था। बाकी लोग अभी और दो दिन रास्ते में घूमते-चलते हुए वापस घर जाने वाले थे। मन ही मन एक ख़याल आया, अगर पहले पता होता तो शायद नेपालगंज तक उसे ड्रॉप ही कर देता, या शायद हम एक बार और मिल पाते। पर एक अधूरे मन और अधूरे एहसास के साथ मैं वापस लौट पड़ा। बॉर्डर पार किया, फिर बाइक बहुत तेज़ भगाई, पूरे रास्ते बारिश होती रही, 50 किलोमीटर का रास्ता मैंने लगभग आधे घंटे में ही पार कर लिया, और इस तरह मेरी यह यात्रा समाप्त हुई।